देश की वर्तमान परिस्थितियों पर जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यकारी समिति का स्पष्ट मत सामने आया है, जिसके अनुसार नफरत, विभाजन और असुरक्षा का माहौल देश के भविष्य के लिए खतरनाक है और इस समिति ने छह सूत्रीय मांग-पत्र भी प्रस्तुत किया है।जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यकारी समिति के सदस्यों ने देश की वर्तमान परिस्थितियों को लेकर सर्वसम्मति से एक बयान जारी किया है। इस संबंध में, जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यकारी समिति की एक विशेष सभा 11 जून, 2026 को जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष हजरत मौलाना महमूद असद मदनी की अध्यक्षता में आयोजित की गई, जिसमें देश की वर्तमान स्थित को लेकर एक प्रस्ताव का मसौदा प्रस्तुत किया गया, जिस पर विस्तारपूर्वक विचार-विमर्श के बाद इसे पारित कर दिया गया। बाद में, उक्त प्रस्ताव कार्यकारी समिति के सभी सदस्यों के सामने मंज़ूरी के लिए प्रस्तुत किया गया, जिसे सदस्यों ने सर्वसम्मति से पारित कर दिया।कार्यकारी समिति के सदस्यों ने देश की गंभीर स्थिति और अल्पसंख्यकों के लिए तनावपूर्ण माहौल पर प्रकाश डालते हुए सपष्ट और साफ तौर पर कहा है कि आज हमारा देश एक अत्यंत संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है। गत कुछ वर्षों में सरकारी प्राथमिकताओं और सामाजिक व्यवहार में जो परिवर्तन हुए हैं, वह न केवल एक विशेष वर्ग, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र के लिए चिंता का विषय हैं। घृणास्पद भाषणों ने वातावरण को और अधिक दूषित कर दिया है। धार्मिक उन्माद, जो कभी समाज के हाशिए पर सुनाई देता था, आज वह राष्ट्रीय राजनीति और सत्ता प्रतिष्ठान के बयानों का हिस्सा बनता जा रहा है। वास्तविकता यह है कि घृणा अब धमकी आधारित राजनीति का रूप धारण कर चुकी है। एक संगठित सोच के तहत इस महान लोकतांत्रिक देश के संवैधानिक स्वरूप को बदलने का प्रयास किया जा रहा है, जिसको बल देने में न्यायपालिका के रवैये की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
कार्यकारी समिति के सदस्यों ने कहा कि हम अत्यंत निराशा के साथ इस बात को व्यक्त करते हैं कि अल्पसंख्यकों के सम्मान और गरिमा, उनके धार्मिक अनुष्ठानों, मस्जिदों, मदरसों और कब्रिस्तानों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। सामान्य बहानों की आड़ में उनके खिलाफ कार्रवाई और तोड़फोड़ बिना किसी रोकटोक के जारी है। इन परिस्थितियों ने देश के एक बड़े वर्ग में यह भावना जागृत की है कि इस देश में “आंतरिक उपनिवेशवाद” स्थापित किया रहा है, जहां दबाव, अधिकारों से वंचित होने और निरंतर असुरक्षा का भाव हावी होता जा रहा है। किसी भी सभ्य समाज में धार्मिक स्थलों से संबंधित मामलों को न्याय, पारदर्शिता और कानूनी आवश्यकताओं के अनुसार निपटाया जाना चाहिए।कार्यकारी समिति के सदस्यों ने कहा कि इसी तरह मतदान के अधिकार और चुनावी प्रक्रिया से संबंधित हालिया घटनाक्रम भी कई गंभीर प्रश्न खड़े कर रहे हैं। नागरिक पहचान और नागरिकता के नाम पर चलने वाली विभिन्न कार्रवाइयों ने लाखों नागरिकों में चिंता उत्पन्न कर दी है। यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि इन प्रयासों का उद्देश्य केवल मतदाता सूचियों में सुधार करना नहीं है, बल्कि कुछ विशेष वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सीमित करना है। हालांकि, अगर लोकतंत्र के मूल स्तंभ अर्थात् मतदान के अधिकार पर संदेह और अविश्वास पैदा होने लगे, तो इसके परिणाम दूरगामी और खतरनाक होंगे।
कार्यकारी समिति के सदस्यों ने कहा कि इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि देश की वास्तविक समस्याएं पीछे छूटती जा रही हैं। युवा रोजगार को लेकर चिंतित हैं, किसान कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, महंगाई आम आदमी का जीवन कठिन बना रही है, जबकि शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र अनेक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। इसके बावजूद राष्ट्रीय विमर्श को बार-बार धार्मिक विवादों और सांप्रदायिक बहसों की ओर मोड़ दिया जाता है। राष्ट्रों की ऊर्जा वास्तविक समस्याओं के समाधान पर खर्च होनी चाहिए, न कि ऐसे विवादों पर जो समाज को विभाजित करें और जनता का ध्यान मूल मुद्दों से भटका दें।कार्यकारी समिति के सदस्यों ने कहा कि अगर आज किसी एक समुदाय के अधिकारों, पहचान और गरिमा को ठेस पहुंचाई जा सकती है, तो कल यही रवैया किसी दूसरे समुदाय के साथ भी अपनाया जा सकता है। इसलिए, यह समस्या केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के संवैधानिक भविष्य, लोकतांत्रिक मूल्यों और कानून के शासन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दा है।कार्यकारी समिति के सदस्यों ने कहा कि इतिहास साक्षी है कि राष्ट्र घृणा से नहीं बनते, नफरत राष्ट्रों को तोड़ती है। राष्ट्र न्याय से मजबूत होते हैं, विश्वास से आगे बढ़ते हैं और समानता से विकास करते हैं। अगर हमने आज न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए सामूहिक प्रयास नहीं किए, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। इतिहास का अनुभव बताता है कि जब समाजों में घृणा को राजनीतिक शक्ति का साधन बना लिया जाता है, तो उसकी आग अंततः पूरे समाज को अपनी चपेट में ले लेती है।जमीअत उलमा-ए-हिंद ने भारत सरकार और सभी राज्य सरकारों से मांग करते हुए कहा कि अवैध घुसपैठ से संबंधित सभी कार्रवाइयां पूरी पारदर्शिता के साथ, कानूनी प्रावधानों और न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप की जाएं। पुश-बैक को स्टंट (मात्र दिखावे या प्रचार) के बजाय गंभीर कानूनी प्रक्रिया के रूप में किया जाए। किसी भी नागरिक के खिलाफ धर्म, भाषा, नस्ल, वेशभूषा या क्षेत्रीय पहचान के आधार पर प्रोफाइलिंग और भेदभावपूर्ण कार्रवाइयों को तत्काल रोका जाए। जनसांख्यिकीय परिवर्तनों और घुसपैठ के मुद्दे को राजनीतिक या चुनावी लाभ के लिए किसी भी प्रकार से इस्तेमाल न किया जाए और सार्वजनिक पद पर आसीन व्यक्ति जिम्मेदार और तथ्यों पर आधारित संवाद शैली अपनाए। घृणा, सामाजिक बहिष्कार और सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा देने वाले तत्वों के विरुद्ध बिना किसी भेदभाव के कानूनी कार्रवाई की जाए।धर्म, जाति, नस्ल, भाषा या पहचान के आधार पर हिंसा, लिंचिंग, घृणास्पद हमलों, संगठित उत्पीड़न और नफरती भाषण को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए।सांप्रदायिक दंगों, नरसंहार या मॉब लिंचिंग की स्थिति में, संबंधित प्रशासन को जवाबदेह ठहराया जाए। लापरवाही, गैर-जिम्मेदारी या पक्षपात सिद्ध होने पर संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जाए और पीड़ितों को उचित मुआवजा, कानूनी सुरक्षा और पुनर्वास प्रदान किया जाए। इसके साथ ही, फास्ट ट्रैक अदालतों के माध्यम से ऐसे मामलों के शीघ्र निस्तारण के लिए एक प्रभावी प्रणाली स्थापित की जाए।शिक्षा, रोजगार, कौशल और सरकारी संस्थानों में वंचित समूहों और अल्पसंख्यकों के प्रभावी प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं, ताकि सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के विकास, भागीदारी और गरिमापूर्ण जीवन के समान अवसर प्राप्त हों।भारत के संविधान के अंतर्गत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता, पूजा स्थलों, अल्पसंख्यकों के शैक्षिक अधिकारों और उनके धार्मिक संस्थानों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। साथ ही, संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों को प्रशासनिक या कानूनी बहाने से प्रतिबंधित या सीमित न किया जाए।
मतदाता सूची, नागरिकता और पहचान से संबंधित सभी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, निष्पक्षता और संवैधानिक प्रावधानों का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित किया जाए। इसके साथ ही, राष्ट्रीय मतदाता सूची (एनआरसी) और विदेशी नागरिक संबंधित मामलों में किसी भी नागरिक को संपूर्ण कानूनी प्रक्रिया, प्रभावी सुनवाई और उपलब्ध कानूनी अधिकारों के उपयोग का अवसर प्रदान किए बिना विदेशी घोषित कर जबरन देश से निष्कासित करने की प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए, क्योंकि इससे न केवल मूलभूत मानवाधिकार प्रभावित होते हैं बल्कि देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को भी क्षति पहुंचती है।
भारत सरकार अपनी ऐतिहासिक विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकार सिद्धांतों के अनुरूप, फिलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार और मानवीय सहायता की निर्बाध आपूर्ति का हर स्तर पर समर्थन करे और इस संबंध में प्रभावी राजनयिक भूमिका निभाए। इसके साथ ही, सरकार इजरायल के साथ सैन्य, युद्ध या रक्षा सहयोग और समझौतों पर भी पुनर्विचार करे ताकि भारत का पक्ष और दृष्टिकोण न्याय, शांति और मानवाधिकारों के सार्वभौमिक सिद्धांतों के अनुरूप बना रहे।











