डॉ. राजीव कुरेले एसोसिएट प्रोफेसर उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय देहरादून
कोरोना वायरस का संक्रमण भले ही पहले जैसा व्यापक नहीं रहा हो, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं है। बदलते मौसम, लापरवाही और इम्यूनिटी में गिरावट जैसे कारणों से कोविड के नए मामलों में फिर से इजाफा देखा जा रहा है। ऐसे में उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय, देहरादून के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राजीव कुरेले ने एक बार फिर लोगों को जागरूक करते हुए कहा है — “कोविड अभी गया नहीं है, इसलिए ‘सावधानी’ अब भी हमारी सबसे बड़ी ‘सुरक्षा’ है।”
क्यों है अब भी कोविड को लेकर सतर्कता जरूरी?
डॉ. कुरेले का कहना है कि बदलते वेरिएंट्स और कमजोर हो चुकी सामूहिक सतर्कता के चलते वायरस फिर से एक्टिव हो सकता है। “जिन्हें पहले संक्रमण हो चुका है या वैक्सीन लगी है, उन्हें भी पूरी सुरक्षा नहीं है। अगर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम है या व्यक्ति पहले से किसी बीमारी से ग्रस्त है, तो संक्रमण का खतरा अधिक हो जाता है।”
वह चेतावनी देते हैं कि भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों, बंद कमरे या एयर-कंडीशन्ड माहौल में वायरस तेजी से फैल सकता है। “कुछ लोग बिना लक्षणों के भी वायरस के वाहक हो सकते हैं, जो दूसरों के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं,” उन्होंने कहा।
आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से कोविड का बचाव
डॉ. कुरेले आयुर्वेद विशेषज्ञ हैं और उन्होंने कोविड से लड़ने में प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति की भूमिका को रेखांकित किया है। उन्होंने बताया कि आयुर्वेद में तीन मूल सिद्धांत — वात, पित्त और कफ — शरीर की स्थिरता बनाए रखते हैं। कोविड जैसे संक्रमण इन दोषों में असंतुलन लाते हैं, जिसे ठीक करना ही आयुर्वेद का उद्देश्य होता है।
उन्होंने कहा —
“आयुर्वेद केवल बीमारी का इलाज नहीं करता, यह शरीर को बीमारी के विरुद्ध खड़ा करने की शक्ति देता है।“
डॉ. राजीव कुरेले की कोविड से बचाव हेतु 7 प्रमुख सलाह
- मास्क का फिर से करें उपयोग
- सार्वजनिक स्थलों पर मास्क जरूर पहनें, खासकर बंद जगहों पर।
- सर्दी-खांसी को हल्के में न लें
- हल्के लक्षण भी कोविड के हो सकते हैं। जांच जरूर कराएं।
- आयुर्वेदिक काढ़ा और हर्बल टी का सेवन
- तुलसी, गिलोय, अदरक, दालचीनी और अश्वगंधा से बना काढ़ा प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
- प्राणायाम और योग को बनाएं दिनचर्या का हिस्सा
- “अनुलोम-विलोम” और “कपालभाति” जैसे प्राणायाम फेफड़ों की क्षमता बढ़ाते हैं।
- गर्म पानी पिएं, ठंडे पेय से परहेज करें
- गला सुरक्षित रहेगा और संक्रमण का खतरा कम होगा।
- नींद और मानसिक शांति को दें महत्व
- तनाव रोग प्रतिरोधकता को घटाता है। ध्यान और आयुर्वेदिक चूर्ण उपयोगी हैं।
- वैकल्पिक चिकित्सा को न करें नजरअंदाज
- आयुष मंत्रालय द्वारा प्रमाणित आयुर्वेदिक दवाओं और नास्य चिकित्सा का करें इस्तेमाल।
बूस्टर डोज और टेस्टिंग का महत्व
हालांकि आयुर्वेदिक उपाय शरीर को अंदर से मज़बूत करते हैं, पर डॉ. कुरेले आधुनिक चिकित्सा की भूमिका को भी उतना ही जरूरी मानते हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे बूस्टर डोज जरूर लगवाएं और किसी भी लक्षण के सामने आते ही तुरंत कोविड जांच कराएं।
उन्होंने यह भी जोड़ा, “कोविड टेस्ट करवाना किसी कलंक की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि यह जिम्मेदारी का परिचायक है। इससे आप खुद के साथ-साथ अपने परिवार और समाज की भी रक्षा करते हैं।”
उत्तराखंड: आयुष प्रदेश बनने की ओर
डॉ. कुरेले ने उत्तराखंड सरकार की सराहना करते हुए कहा कि राज्य “आयुष प्रदेश” बनने की दिशा में अग्रसर है। कोविड काल में जब ऑक्सीजन, दवाएं और बेड की कमी ने सारे देश को हिला दिया था, तब उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में आयुर्वेद और घरेलू उपचारों ने काफी हद तक लोगों की रक्षा की।
“हमारा प्रयास है कि आयुर्वेद को गांव-गांव तक ले जाएं ताकि लोग रोग से पहले ही सचेत हो सकें,” उन्होंने कहा।
कोविड भले ही अब महामारी की कैटेगरी से बाहर आ चुका हो, लेकिन लापरवाही जानलेवा हो सकती है। डॉ. राजीव कुरेले जैसे विशेषज्ञों की चेतावनियां हमें याद दिलाती हैं कि ‘स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है’ — और इसकी रक्षा तभी संभव है जब हम सावधानी को अपनी दिनचर्या बना लें।
कोविड से लड़ाई अब केवल सरकार या डॉक्टरों की नहीं रही — यह हर नागरिक की जिम्मेदारी है। और इस जिम्मेदारी का पहला कदम है — जागरूकता और सतर्कता।











