चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने केंद्र, NCERT और CBSE से दो नई याचिकाओं पर 10 दिनों में जवाब मांगा है, जिनमें बोर्ड की उस पॉलिसी को चुनौती दी गई है जिसमें क्लास-9 के स्टूडेंट्स के लिए दो भारतीय भाषाओं समेत तीन भाषाओं की पढ़ाई ज़रूरी है। केंद्र, CBSE और NCERT ने सुप्रीम कोर्ट में नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 के थ्री-लैंग्वेज फ्रेमवर्क को लागू करने का पुरजोर बचाव करते हुए कहा कि यह “मल्टीलिंगुअलिज्म और नेशनल इंटीग्रेशन” को बढ़ावा देने के लिए ज़रूरी है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय, सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) और नेशनल काउंसिल ऑफ़ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) ने अलग-अलग हलफनामों में, देश भर में CBSE से जुड़े स्कूलों में अपनाई गई थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज करने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने मांगा 10 दिनों में जवाब
इस बीच, चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने मंगलवार को केंद्र, NCERT और CBSE से दो नई याचिकाओं पर 10 दिनों में जवाब मांगा है, जिनमें बोर्ड की उस पॉलिसी को चुनौती दी गई है जिसमें क्लास-9 के स्टूडेंट्स के लिए दो भारतीय भाषाओं समेत तीन भाषाओं की पढ़ाई ज़रूरी है।NEP के बड़े शैक्षिक सुधारों का हिस्सा है थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी
शिक्षा मंत्रालय की ओर से ने एक एफिडेविट में कहा है कि मल्टीलिंगुअलिज़्म और नेशनल इंटीग्रेशन को बढ़ावा देने के लिए थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी ज़रूरी है। इसमें कहा गया है कि लैंग्वेज एजुकेशन और मल्टीलिंगुअल लर्निंग से जुड़ी सिफारिशें NEP के तहत सोचे गए बड़े एजुकेशनल सुधारों का हिस्सा हैं। मंत्रालय ने कहा है, “नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फॉर स्कूल एजुकेशन (NCFSE) 2023, NEP-2020 के हिसाब से, थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला को लागू करने की बात दोहराता है और सिफारिश करता है कि स्टूडेंट्स ग्रेड VI से X के दौरान तीन भाषाएं पढ़ें, जिनमें से कम से कम दो भाषाएं मूल भारतीय भाषाएं हों।”
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी.मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट आनंद ग्रोवर और गोपाल शंकरनारायणन की दलीलों पर गौर किया। चीफ जस्टिस ने कहा, ”हम इन याचिकाओं पर 29 जुलाई को सुनवाई करेंगे।” अमनदीप कौर और अर्पण रॉय चौधरी ने नयी याचिकाएं दायर की हैं। उन्होंने केंद्र, सीबीएसई और एनसीईआरटी को इस मामले में पक्षकार बनाया है। अभिभावकों और स्कूलों ने उठाई किताबों व संसाधनों की कमी की समस्या
एक वकील ने कहा कि अभिभावकों और स्कूलों ने पाठ्यपुस्तकों की भारी कमी और अचानक इस नीति को लागू करने के बोझ का जिक्र किया है। ग्रोवर ने दलील दी, ”वे ऐसे परिपत्र लागू कर रहे हैं जो शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के विपरीत और अवैध हैं। वैकल्पिक व्यवस्था दिए बिना भाषाएं थोपी जा रही हैं। यदि संस्कृत के बिना पंजाबी पढ़ाई जाएगी, तो उसके लिए शिक्षक कहां से आएंगे?” उन्होंने कहा, ”हम यहां छठी और नौवीं कक्षा के छात्रों के हितों की बात कर रहे हैं। सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्या यह है कि एक राज्य ने एक जुलाई तक सभी पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है, लेकिन अभी 22 भाषाओं में से केवल तीन भाषाओं की ही किताबें उपलब्ध हैं। इसके साथ ही शिक्षकों की कमी के कारण भी कठिनाइयां खड़ी हो गई हैं।”छात्रों पर अचानक नई भाषा थोपने और बुनियादी ढांचे पर उठे सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा, ”कोई बच्चा अब तक अंग्रेजी और फ्रेंच पढ़ रहा है और अचानक कक्षा नौवीं के 14 वर्षीय छात्र से कहा जाता है कि अब तमिल भी सीखो। ऐसे में शिक्षक, आवश्यक बुनियादी ढांचा और अन्य संसाधन कहां से आएंगे?” इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ”हम नोटिस जारी कर रहे हैं। इस बीच सभी पक्ष अपना जवाब दाखिल करें।” अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि सीबीएसई ने देशभर के लिए एक परिपत्र जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि अगले शैक्षणिक सत्र से छात्रों को तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा। सीबीएसई के जारी सर्कुलर के मुताबिक एक जुलाई से कक्षा नौवीं के छात्रों के लिए कम से कम दो भारतीय भाषाओं सहित तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य कर दिया गया है। यह कदम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (एनसीएफ-एसई) 2023 के अनुरूप सीबीएसई की अध्ययन योजना को समायोजित करने की प्रक्रिया का हिस्सा है।











