मुंबई-मुंबई के एक एडिटिंग स्टूडियो में बैठा था। सामने स्क्रीन पर एक्शन-पैक्ड सीन चल रहा था। गोलियां, गालियां, गलियों की दहशत। फिर कैमरा कट करता है और स्क्रीन पर आती है एक लड़की – भोली सी, साड़ी में, आंखों में डर भी है और सपना भी। चेहरे पर कुछ जाना-पहचाना सा भाव। तभी बगल में बैठे डायरेक्टर बोले –
“यह है अक्षिता अग्निहोत्री, हमारी फिल्म बॉम्बे की हीरोइन।”
अब बात निकली है तो बता दें कि ‘बॉम्बे’ कोई लव स्टोरी टाइप फिल्म नहीं है, इसमें अंडरवर्ल्ड है, प्यार है, धोखा है और गांव से आई लड़की की मुंबई में फंसने की पूरी जर्नी है। और इस पूरी फिल्म की नायिका हैं अक्षिता अग्निहोत्री, जिनका चेहरा देखने लायक है और कहानी सुनने लायक।
पटियाला की बिटिया, मम्मी की जांबाज़ बेटी
अक्षिता की कहानी फिल्मी नहीं है, असली है। पंजाब के पटियाला से आईं और मुंबई में बिना किसी फिल्मी चाचा-ताऊ के सीधी घुस गईं सिनेमा में। साथ आईं थीं उनकी मां – नेहा शर्मा, जो टीचर हैं और सिंगल मदर भी। मम्मी ने कहा –
“बेटी का सपना है तो मैं भी साथ चलूंगी।”
और चल पड़ीं दो औरतें – सपनों की नगरी की तरफ।
ग्लैमर की दुनिया में पहला धमाका
अक्षिता दिखने में जितनी सुंदर, उतनी ही मेहनती भी। किंगफिशर कैलेंडर गर्ल बनीं, फिर फेमिना मिस इंडिया चंडीगढ़ की रनरअप, उसके बाद मिस ब्यूटीफुल लिप्स, मिस टाइमलेस ब्यूटी, फैशन आइकॉन जैसे टाइटल झटक लिए।
बंगलौर फैशन वीक, गोवा इंटरनेशनल, चेन्नई फैशन वीक, सब जगह रैम्प वॉक किया। कई बार तो वो रैम्पवॉक सिखाने वाली ट्रेनर भी बनीं। मतलब ग्लैमर को उन्होंने सीरियसली लिया और इस्तेमाल किया एक नई शुरुआत के लिए।

फिल्म ‘बॉम्बे’ में क्या रोल है?
अब बात करते हैं फिल्म की। ‘बॉम्बे’ एक सीधी लड़की की कहानी है, जो गांव से शहर आती है, पैसे कमाने। लेकिन मुंबई में मोहब्बत, मजबूरी और माफिया – तीनों से टकरा जाती है। अक्षिता चार भाषाओं – हिंदी, मराठी, तेलुगु, कन्नड़ – चारों में लीड कर रही हैं।
“एक ही रोल, चार इंडस्ट्री में। मजा आ गया,” हंसती हैं वो।
वो कहती हैं –
“इस फिल्म से बड़े पर्दे पर मेरी शुरुआत हो रही है। मेरी मां ही मेरी गॉडमदर हैं। कोई बड़ा नाम नहीं, बस हम दोनों की मेहनत है।”
आगे क्या प्लान है?
फिलहाल अक्षिता का पूरा फोकस ‘बॉम्बे’ की रिलीज पर है, जो जून में आ रही है। उसके बाद मिलन लूथरिया की ‘सुल्तान ऑफ दिल्ली’ जैसे प्रोजेक्ट भी हैं, लेकिन वो कहती हैं –
“बाकी बाद में, अभी तो बॉम्बे की बारी है।”
अंत में एक जरूरी बात
मुंबई में हज़ारों लड़कियां आती हैं, लेकिन सबको पर्दे पर लीड रोल नहीं मिलता। अक्षिता को मिला, क्योंकि उन्होंने किसी से मांग के नहीं, खुद से छीन के लिया। और साथ थीं उनकी मां – जो खुद एक फिल्म की हीरोइन से कम नहीं।
तो जून में जब ‘बॉम्बे’ रिलीज हो, तो याद रखिएगा – ये सिर्फ एक फिल्म नहीं, एक मां-बेटी की जीत है।











