यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल

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एजेंसी न्यूज
नई दिल्ली। केंद्र सरकार उच्च शिक्षण संस्थानों में जातीय भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी के 2026 के इक्विटी नियमों पर दोबारा विचार कर रही है। ये नियम जनवरी में अधिसूचित हुए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ही दिनों बाद इन पर रोक लगा दी थी। इस पर पुनर्विचार के बारे में केंद्र ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी।
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी के 2026 के इक्विटी नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ इस मामले की सुनवाई की। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि यूजीसी के इन नियमों पर दोबारा विचार किया जा रहा है। इसके बाद मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए आगे बढ़ा दी गई। फिलहाल स्थिति यह है कि 2026 के नियमों पर रोक है, 2012 के नियम लागू हैं।
13 जनवरी को यूजीसी यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु यूजीसी समता विनियम 2026 को अधिसूचित किया। इस नियम का मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करना है। यह नियम अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, विकलांग व्यक्तियों को किसी भी तरह के भेदभाव से सुरक्षा देता है। नए नियम को सभी विश्वविद्यालय को लागू करना होगा। इसको कैसे लागू किया जाएगा इसके लिए भी यूजीसी ने एक पूरा खाका तैयार किया है।
समान अवसर केंद्र- प्रत्येक संस्थान को वंचित समूहों के लिए नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन की निगरानी के लिए समान अवसर केंद्र स्थापित करने होंगे। इसमें संस्थान के पांच फैकल्टी सदस्य होंगे। इन पांच सदस्यों के लिए किसी भी कैटेगरी के लिए कोई आरक्षण नहीं है।
समता समिति- समान अवसर केंद्र को एक समता समिति बनानी होगी। इसके अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख होंगे। इसमें एससी, एसटी, ओबीसी, विकलांगों और महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी अनिवार्य होगा। इस समिति में कुल दस सदस्य होंगे।
समता समूह- प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान निगरानी रखने तथा परिसर में किसी भी भेदभाव को रोकने के लिए एक छोटी इकाई भी गठित करेगा, जिसे ‘समता समूह (इक्विटी स्क्वॉड)’ कहा जाएगा। उच्च शिक्षण संस्थान आवश्यक संख्या में समता समूह गठित कर सकता है, और ऐसे समूह गतिशील रहेंगे तथा संवेदनशील स्थानों पर नियमित रूप से निरीक्षण करेंगे।
विश्वविद्यालय में दाखिले के समय सभी छात्रों को किसी भी तरह के भेदभाव नहीं करने के लिए एक घोषणा-पत्र देना होगा।
संस्थानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि छात्रावास आवंटन, कक्षाओं या मेंटरशिप समूहों के चयन में किसी भी तरह का भेदभाव न हो और पूरी प्रक्रिया निष्पक्षता के साथ हो। छात्रों के लिए 24/7 समता हेल्पलाइन और भेदभाव की रिपोर्ट करने के लिए आॅनलाइन पोर्टल बनाना होगा।
प्रत्येक विभाग में ‘समता दूत’ नियुक्त किए जाएंगे, जो समता के उल्लंघन की सूचना समान अवसर केंद्र को बिना किसी देरी के देंगे। जांच के दौरान पीड़ित या गवाह बने कर्मचारी या अध्यापक को उत्पीड़न या प्रतिशोध के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान की जाएगी। यदि कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो यूजीसी उसकी अनुदान सहायता रोक सकता है, उसे डिग्री देने से मना कर सकता है या मान्यता प्राप्त संस्थानों की सूची से हटा सकता है।
नए इन नियमों का पहले सोशल मीडिया पर विरोध शुरू हुआ। देखते-देखते इसके विरोध में जगह-जगह प्रदर्शन होने लगे। मामला बढ़ते-बढ़ते सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। यहां इसे चुनौती दी गई है। इन नियमों का विरोध मुख्य रूप से सामान्य वर्ग के लोगों की तरफ से देखने को मिल रहा है। जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने मिलकर ह्यसवर्ण समाज समन्वय समिति (र-4)ह्ण का गठन किया, ताकि रेगुलेशन के खिलाफ संगठित विरोध किया जा सके।