नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी साल 2022 में बनी थी। 2023 में चुनाव भी लड़ा, लेकिन कोई भी उम्मीदवार नहीं जीता। अब तक यह पार्टी गुमनाम सी थी, लेकिन टीएमसी सांसदों के विलय की बात सामने आने के बाद सभी इसके बारे में जानना चाहते हैं।
पश्चिम बंगाल की सियासत में अचानक ही नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया की चर्चा सबसे ज्यादा होने लगी है। इस पार्टी का कोई भी उम्मीदवार अब तक विधानसभा चुनाव नहीं जीता है, लेकिन जल्द ही इस पार्टी के पास 20 सांसद हो सकते हैं। ऐसे में यह पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना लेगी, जबकि दो दिन पहले तक किसी को यह भी नहीं पता था कि इस नाम की कोई पार्टी भी है। यहां हम इसके बारे में बता रहे हैं।पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा जैसे उत्तर पूर्वी राज्यों में NCPI की मौजूदगी है। बांग्लादेश में भी एनसीपी नाम की एक पार्टी है, लेकिन इसका NCPI से कोई संबंध नहीं है। शरद पवार या अजित पवार की एनसीपी से भी इस पार्टी का कोई लेना देना नहीं है। बांग्लादेश की एनसीपी 2025 में छात्र आंदोलन से बनी पार्टी है। वहीं, शरद पवार की एनसीपी सालों पहले कांग्रेस से टूटकर बनी थी।नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में टीएमसी के 20 सांसदों के विलय पर पार्टी के फाउंडर और नेशनल ऑर्गनाइजिंग सेक्रेटरी शांतनु डे ने कहा, “आज सुबह, हमारी पार्टी के लीडर्स की एक ऑनलाइन मीटिंग हुई और हमने इसका स्वागत किया। अब तक, मैं पार्टी के बारे में सभी फैसले लेता था, लेकिन पार्टी के मेंबर्स से सलाह करके। मैंने शेवली कुंडू को कई बार फोन किया, लेकिन उन्होंने कहा कि वह व्यस्त हैं। उनके पति, जो पार्टी के ट्रेजरर थे, उनका फोन नंबर स्विच ऑफ है। हमें कोई जानकारी नहीं है कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। पार्टी 2023 में रजिस्टर हुई थी। 2025 के बाद, उन्होंने हमसे बात करना बंद कर दिया। हम पार्टी चलाना चाहते थे, लेकिन हमें फाइनेंशियल दिक्कतें आ रही थीं। मैं 2022 से पार्टी के लिए काम कर रहा हूं। हमने त्रिपुरा में एनडीए को सपोर्ट किया था।”इलेक्शन कमीशन के रिकॉर्ड के अनुसार नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया 2022 से एक अनरिकॉग्नाइज्ड पॉलिटिकल पार्टी के तौर पर रजिस्टर्ड है। जिन पार्टियों के पास क्षेत्रीय या राष्ट्रीय दल का दर्जा हासिल करने के लिए वोट शेयर नहीं होता है या जो पार्टियां चुनाव नहीं लड़ती हैं, उन्हें अनरिकॉग्नाइज्ड पॉलिटिकल पार्टी माना जाता है। जैसे ही कोई पार्टी चुनाव लड़कर जरूरी वोट शेयर हासिल कर लेती है। वैसे ही उसका दर्जा बदल दिया जाता है।
त्रिपुरा की राजनीति पर करीब से नजर रखने वाले लोग भी नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दे पा रहे हैं। इसकी वजह यह है कि यह पार्टी बेहद गुमनाम थी। चुनाव जीतना और जोर-शोर से चुनाव प्रचार करना तो दूर पार्टी का कोई भी उम्मीदवार नोटा से बुहत ज्यादा वोट नहीं हासिल कर पाया है। 2023 के त्रिपुरा असेंबली इलेक्शन में, NCPI के कैंडिडेट्स ने 2 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सभी में करारी हार मिली। खबरों के अनुसार यह पार्टी मेघालय में भी खुद को मजबूत कर रही है। वहीं, पश्चिम बंगाल में तो अचानक ही तीसरी बड़ी पार्टी बनने जा रही है।
नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया की अध्यक्ष शेवली कुंडू हैं। वह कलकत्ता उच्च न्यायालय में वकील हैं। इसके अलावा सल्कट दास पार्टी के महासचिव और सुदाम जेटी इसके कोषाध्यक्ष हैं। शेवली के पति उत्तिया कुंडू पार्टी के उपाध्यक्ष भी हैं। वह पेशे से शिक्षक हैं। एनसीपीआई ने 2023 में त्रिपुरा के धलाई जिले की चावमानु सीट, उनाकोटी जिले की कैलाशहर सीट, अम्बासा और करमचारा सीट पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से दो उम्मीदवारों की दावेदारी रद्द हो गई थी। चावमानु और कैलाशहर सीटों पर चुनाव लड़ते हुए पार्टी के कैंडिडेट्स को कुल 822 वोट (0.03 परसेंट) मिले थे।
मजेदार बात यह है कि पार्टी ने 2023 विधानसभा चुनाव के दौरान दलबदल के खिलाफ नारा बनाया था। इसमें कहा गया था कि “अपने अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलबदलुओं को अस्वीकार करें।” पार्टी के चुनावी पोस्टर में भी यही कहा गया था कि “अपने अधिकारों की रक्षा के लिए, राजनीतिक दलबदलुओं को नकारें। सामाजिक कार्यकर्ताओं का समर्थन करें, न कि राजनीतिक हस्तियों का।” हालांकि, अब यही पार्टी पश्चिम बंगाल में मौजूदा समय के सबसे बड़े दलबदल की वजह से ही चर्चा में आई है।चावमानु से पार्टी के उम्मीदवार रहे बरजेदा त्रिपुरा दलबदल के घटनाक्रम से हैरान नजर आए। उन्होंने कहा, ”मैंने 2023 में चुनाव लड़ा था। अब तीन साल बाद यह सब कैसे हो गया?” लोकसभा के 20 सदस्यों के एनसीपीआई में विलय की खबर सुनकर बरजेदा को यकीन नहीं हुआ। उन्हें आश्चर्य था कि जिस पार्टी का नाम अब राष्ट्रीय राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है, उसी ने कभी उन्हें त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया था। बरजेदा ने बताया कि वह दिहाड़ी मजदूर हैं। उन्होंने कहा, ”2023 में कृष्ण देबबर्मा नाम के एक व्यक्ति ने मुझसे संपर्क किया था। उसी के कहने पर मैंने चुनाव लड़ा। कई वर्ष पहले मैं कांग्रेस का समर्थक था।” हालांकि, कृष्ण देबबर्मा से संपर्क नहीं हो सका। बरजेदा के चुनावी हलफनामे के अनुसार, 2023 में उनकी आयु 62 वर्ष थी। उन्होंने आठवीं तक शिक्षा प्राप्त की थी, चार लाख रुपये की संपत्ति घोषित की थी और अपने पेशे के तौर पर, समाजसेवा से जुड़े होने का उल्लेख किया था। चावमानु सीट पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शंभू लाल चकमा विजयी रहे थे। उन्होंने टिपरा मोथा के हांगसा कुमार त्रिपुरा को 2,899 मतों के अंतर से हराया था। बरजेदा 536 वोट के साथ पांचवें स्थान पर रहे और ‘नोटा’ पर डले 500 वोट से मामूली अंतर से आगे रहे। पार्टी के अन्य उम्मीदवार अंबासा, करमचारा और कैलाशहर सीटों से मैदान में थे। इनमें करमचारा और अंबासा सीट टिपरा मोथा के खाते में गईं, जबकि कैलाशहर से कांग्रेस ने जीत दर्ज की।











