निर्वाचन आयोग ने रविवार को असम में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। असम में 126 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव का आयोजन 9 अप्रैल को एक ही चरण में किया जाएगा। वहीं, चुनाव के परिणाम 4 मई को सामने आएंगे। चुनाव की तारीखें सामने आने के बाद ऐसे में सभी राजनीतिक दल मैदान में उतर चुके हैं और चुनाव प्रचार को तेज कर दिया है। बता दें कि असम में इस वक्त भाजपा के नेतृत्व वाला NDA गठबंधन सत्ता में है। विपक्ष द्वारा बार-बार सत्ता विरोधी लहर की बात कही जा रही है। ऐसे में भाजपा ने क्या तैयारी की है और वे किन मुद्दों के साथ चुनाव मैदान में उतर रहे हैं। आइए जानते हैं इस बारे में।असम में सत्ताधारी बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए, 126 सीटों वाली विधानसभा के आगामी चुनावों में अपने शासन के रिकॉर्ड, संगठनात्मक ताकत और बंटे हुए विपक्ष के भरोसे मैदान में उतरेगी। ताकत की बात करें तो, 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से ही राज्य में बीजेपी का ग्राफ बढ़ा है। 2016 में 60 सीटें जीतकर ये पार्टी पहली बार असम की सत्ता में आई थी। 2021 में इसने अपनी सीटों की संख्या बढ़ाकर 64 कर ली।पार्टी ने समाज के अलग-अलग वर्गों को ध्यान में रखते हुए कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं। हाल के वर्षों में शुरू की गई विकास परियोजनाओं और विद्रोही समूहों के साथ कई शांति समझौतों पर हस्ताक्षर को भी बीजेपी अपनी प्रमुख उपलब्धियों के तौर पर पेश कर रही है। मुख्यमंत्री हिमंता की राजनीतिक शैली काफी मुखर है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने बार-बार राज्य का दौरा किया है, जिससे उनकी “डबल-इंजन सरकार” की दलील को और मजबूती मिली है।
कमजोरियों की बात करें तो जानकारों का मानना है कि एनडीए को सत्ता-विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है, खासकर उन सीटों पर जहां विकास से जुड़ी चिंताएं अब भी बनी हुई हैं। कई मौजूदा विधायकों को भी स्थानीय लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी को अल्पसंख्यक मतदाताओं के एक तबके का विरोध झेलना पड़ सकता है- खासकर बंगाली बोलने वाले मुसलमानों से, क्योंकि बीजेपी “अवैध घुसपैठ” को लेकर लगातार बयानबाजी कर रही है। इसके अलावा, मुख्मयंत्री हिमंता और उनके परिवार पर विपक्ष की ओर से कई बार भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए गए हैं।
हालांकि, पार्टी के पास ऐसी कई चीजें हैं जिनका फायदा वो अपने पक्ष में उठा सकती है। इसमें सबसे प्रमुख बात ये है कि उसे एक बिखरे हुए विपक्ष का सामना करना पड़ रहा है। राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाएं, मतदाताओं की पसंद को सत्ताधारी दल के पक्ष में मोड़ने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
पार्टी कुछ दावेदारों का टिकट काट सकती है। अगर इसे ठीक से नहीं संभाला गया, तो पार्टी आंतरिक कलह का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। हिमंता बिस्वा सरमा की आक्रामक राजनीतिक शैली और तीखे हमले, खास तौर पर मुसलमानों के खिलाफ; कुछ सीटों पर मतदाताओं को बांट सकते हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच दिखी ढिलाई को भी एक ऐसे पहलू के तौर पर देखा जा रहा है, जिससे बीजेपी को सावधान रहने की जरूरत हो सकती है।











