अरुण खेत्रपाल बचपन से बहुत मेधावी छात्र थे। उनके पिता चाहते थे कि अरुण आईआईटी से इंजीनियरिंग करें। लेकिन अरुण के ख्वाब अपने पिता की सोच से कुछ अलग थे। बचपन से ही उनका शौक सेना में जाने का था। उन्होंने लॉरेंस स्कूल, सनावर से पढ़ाई की और उसके बाद एनडीए की परीक्षा पास कर नेशनल डिफेंस एकेडमी में दाखिला लिया। एनडीए से पास होने के बाद आईएमए से ट्रेनिंग लेकर 13 जून 1971 को पूना हॉर्स रेजिमेंट में कमिशंड हुए।अरुण खेत्रपाल का जन्म 14 अक्तूबर, 1950 को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से पाकिस्तान के सरगोधा से ताल्लुक रखता था लेकिन बंटवारे के बाद पूरा परिवार भारत में ही आ गया था। खेत्रपाल का परिवार कई पीढ़ियों से सेना से जुड़ा हुआ था। उनके परदादा सिख खालसा सेना में थे जबकि उनके दादा ने प्रथम विश्व युद्ध में तुर्कों का मुकाबला किया था। अरुण खेत्रपाल के पिता ब्रिगेडियर एम.एल खेत्रपाल ने द्वितीय विश्व युद्ध और 1965 की लड़ाई में हिस्सा लिया था।
अरुण खेत्रपाल ने दुश्मन के खेमे में मचा दी थी खलबली, सिर्फ 21 साल की उम्र में दी शहादत, 71 युद्ध के नायक की अमर कहानी
अरुण खेत्रपाल की स्क्वाड्रन पर पाकिस्तानी टैंकों का हमला शुरू हो चुका था। इसी बीच स्क्वाड्रन कमांडर ने रेडियो पर मदद मांगी। ‘A’ स्क्वाड्रन में तैनात अरुण खेत्रपाल अपनी ट्रूप (टैंकों की टुकड़ी) के साथ मदद के लिए आगे बढ़े। बसंतर नदी पार करते समय पाकिस्तान ओर से एंटी-टैंक गनों से भारी गोलाबारी हुई, लेकिन अरुण ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने दुश्मन की डिफेंस लाइन को ध्वस्त करते हुए पाकिस्तान के कई सैनिकों को बंदी बना लिया। इस लड़ाई में अकेले उनके टैंक ने कई पाकिस्तानी पैटन टैंकों को नष्ट कर दिया। घायल होने और टैंक में गोला लगने के बाद कमांडर ने उन्हें पीछे हटने का आदेश दिया। लेकिन अरुण खेत्रपाल एक इंच भी पीछे हटने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने कहा: “नो सर, आई हैव शॉट डाउन फोर. आई एम गोइंग फॉर मोर.” (सर, मेरी गन अभी फायर कर रही है, जब तक करेगी मैं फायर करता रहूंगा)। अंत में अरुण खेत्रपाल का सामना पाकिस्तानी कमांडर के टैंक से हुआ। यह आमने-सामने की लड़ाई हुई। दोनों ने एक-दूसरे पर गोले दागे। अरुण ने एक और टैंक नष्ट किया, लेकिन उनके टैंक पर दूसरा गोला लगा, जिससे टैंक में आग लग गई और वे शहीद हो गए।अरुण खेत्रपाल ने बसंतर की लड़ाई को अपने अदम्य साहस से एक नया मोड़ दिया। उनकी वीरता के चलते पाकिस्तानी हमला थम गया और भारत की जीत पक्की हो गई। इस लड़ाई को बैटल ऑफ बसंतर के नाम से जाना जाता है। अरुण खेत्रपाल को उनकी वीरता और शहादत के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
बसंतर के युद्ध को भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे भीषण टैंक लड़ाइयों में से एक माना जाता है। इस युद्ध के दौरान अरुण खेत्रपाल ने अपने अदम्य साहस और बलिदान से युद्ध का रुख बदल दिया था। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में 16 दिसंबर को पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के आगे घुटने टेक दिए थे। सेना के वीर जवानों ने अपने शौर्य और कुर्बानी से पाकिस्तान की कमर तोड़कर रख दी थी। इस युद्ध की जब भी चर्चा होती है तो बसंतर की भीषण लड़ाई का खासतौर से जिक्र होता है। इसे भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे भीषण टैंक लड़ाइयों में से एक माना जाता है। इस युद्ध के दौरान भारतीय सेना के सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने अपने अदम्य साहस और बलिदान से युद्ध का रुख बदल दिया था।
आर्मी में सेकेंड लेफ्टिनेंट बनने के महज छह महीने बाद ही 3 दिसंबर 1971 को भारत-पाकिस्तान का युद्ध छिड़ गया। उस समय अरुण अहमदनगर में यंग ऑफिसर्स कोर्स कर रहे थे। कोर्स छोड़कर वे शकरगढ़ सेक्टर में बसंतर नदी के पास पहुंचे और मोर्चा संभाल लिया। यह इलाका नदियों, नालों और बारूदी सुरंगों से भरा हुआ था। यह इलाका टैंकों की आवाजाही के लिए अत्यंत खतरनाक था। बसंतर नदी तक पहुंचने के लिए सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तानी सेना द्वारा बिछाई गई घनी बारूदी सुरंगों को पार करना था।भारतीय सेना की इंजीनियरिंग यूनिट ने अपनी जान जोखिम में डालकर माइनफ़ील्ड में सुरक्षित मार्ग बनाना शुरू किया, जिसके बाद भारतीय बख्तरबंद टुकड़ियां आगे बढ़ीं। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना की 13 लांसर्स रेजिमेंट ने अमेरिकी पैटन टैंकों से भारी काउंटर अटैक किया। भारतीय सेना के पास पुराने सेंचुरियन टैंक थे, लेकिन संख्या में कम थे।











