===== जब रहते थे हम गॉव मे=======

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बडे ही सुहॉवने थे वो दिन जब रहते थे कभी हम गॉव मे।
पुरी दुपहैरी खेला करते थे हम बच्चे पेडो की ठंडी छॉव मे।।

1= गॉव छबडिया तहसील सरधना मेरठ अपना जिला है।
ऐसा कोई सुख न था जिवन का जो बचपन मे हमको ना मिला है।
जब वर्षा होती पानी मे रख देते पकड मकोडा कागज की हम नॉव मे===

2= कच्चे आम, बेलपत्थर,अमरूद,अनार जामने हम चढ पेडो पर खाते थे।
कंधे पर हम टॉग कर बस्ता स्कुल जाने को साथी बच्चो का आवाज लगाते थे।।
दोडे दोडे चले जाते थे हम कच्चे रास्तो पर चप्पल भी नही होती थी पॉव मे

3= कोई किसी को गम नही था सब रहते मिलकर मकान सभी के कच्चे थे।
अभिमान नही था किसी के दिल मे भी सचमुच मे दिन बडे ही वो अच्छे थे।।
जब भी पापा या मम्मी घर का कुछ समान मगॉते दुकान से हम खाते चिज लूभाव मे

4= कोठी गाडी दौलत सब है अब शहर मे पर शकून कहॉ अब मिलता है।
जब भी आ जाती याद गॉव की दिल होकर घालल आॅसू आॅखो से ढलता है।।
हमने तो कभी अपने माता पिता के आगे मुहू ना खोला अब बच्चे आ जाते तॉव मे
बडे ही सुहॉवने थे वे दिन।
कैप्टन रि कवि नरेन्द्र कुमार।