सम्पादकीय
पहलगाम में हुए जघन्य आतंकी हमले ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी तत्व मानवता के दुश्मन हैं। इस घटना में पर्यटकों को निशाना बनाना, उनके धर्म की पहचान कर उन्हें मौत के घाट उतारना न केवल नृशंसता की पराकाष्ठा है, यह हमला योजनाबद्ध था, हमलावरों को न सिर्फ सुरक्षा इंतजामों की जानकारी थी, बल्कि वे पूरी तैयारी के साथ आए थे। यह हमला महज कुछ लोगों की जान नहीं लेता, यह देश की अस्मिता और आम जनमानस के मनोबल पर चोट करता है।
अब वक्त आ गया है कि पाकिस्तान को कूटनीतिक स्तर पर ऐसी चोट दी जाए, जिससे वह दोबारा ऐसी हरकत करने से पहले सौ बार सोचे। सिंधु जल समझौते को रद्द करना इसी दिशा में एक प्रभावी कदम हो सकता है। यह पानी की राजनीति नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है। युद्ध किसी भी देश की तरक्की में बाधा होता है, लेकिन कूटनीतिक और आर्थिक जवाब भी उतने ही मारक हो सकते हैं—अगर वे सुनियोजित हों।
पाकिस्तान को अब यह अहसास दिलाना जरूरी है कि भारत न तो सहने को मजबूर है, न ही भूलने को। हमें ऐसा जवाब देना होगा कि आने वाली पीढ़ियां भी जानें कि भारत की सहनशक्ति की सीमा है—और उस सीमा के पार जवाब निर्णायक और अंतिम होता है।











