अडाण अडाणी अडाणी : वास्तविकता और भिन्नता

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शिशिर कुमार गुप्ता
लेखक 44 वर्षों से शासन से मान्यता प्राप्त पत्रकार, प्रदेश में और देश में विभिन्न सामाजिक व पत्रकार संगठनों सम्मानित एवं धार्मिक संस्थानों का संरक्षक है।
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आज चाहे टीवी हो या रैली हो, या कहीं पर कोई मीटिंग हो हर जगह चर्चा में अडाणी है अब तो हद यह तक हो गई कि पार्लियामेंट में भी बजट के स्थान पर विपक्षी दल अडाणी पर ही चर्चा करने की मांग करते हैं। यदि हम टीवी चैनलों पर आने वाली परिचर्चाओं को ध्यान से देखें जिसमें विपक्षी दल, अर्थशास्त्री, राजनीतिक विशेषज्ञ एवं सत्तारूढ़ भाजपा के प्रवक्ता बैठे होते हैं में अडाणी पर ही चर्चा होती है कोई चर्चा ऐसी नहीं होती जिसमें अडाणी का नाम न आये। विपक्षी दल मोदी सरकार पर अडाणी को नियम विरूद्ध टेण्डर देने एवं बैंकों एवं अन्य सरकारी संस्थाओं में घाटे के लिए जिम्मेदार व अडाणी की सम्पत्ति को बढ़ावा देने में खास भूमिका मानते हैं कुछ तो यहां तक आरोप लगा देते हैं कि जब अडाणी जब विश्व में इतने बड़े पूंजीपति है तो देश में आय के अनुसार टैक्स क्यों नहीं देते हैं यह आरोप कहां तक सत्य है, असत्य है हम नहीं कह सकते। पर मोदी सरकार को घेरने का हर समय विषय यही बन चुका है अगर हम टीवी पर आ रही इन चर्चाओं को ध्यान से देखें तो हम यह भी पायेंगे कि जब विपक्षी दल मोदी सरकार पर अडाणी को नियम विरूद्ध फायदा पहुंचाकर धन अर्जित कराने में सहायता करते हैं का आरोप लगाते हैं तो सत्तारूद्ध भाजपा के प्रवक्ता उसका उत्तर भी देते हैं और वह यह भी बताते हैं कि ऐसी कौन सी सरकार थी जिसने अडाणी को सहायता नहीं की और उसकी सम्पत्ति में बढ़ृोत्तरी नहीं कराई इसके लिए ताजा मिसाल तो वह यह भी देते हैं कि कांग्रेस के मुख्यमंत्री के बराबर राजस्थान में अडाणी जी बैठते हैं और अपनी रैली में राहुल गांधी जी जब उनको अडाणी जी कहकर संबोधित करते हैं तो राहुल गांधी जी पर भी यह आरोप लगता है कि कल तक हम दो हमारे दो की बात कहने वाले राहुल जी अडाणी के नाम के आगे जी क्यों लगाते हैं तो उसका उत्तर एक ही मिलता है क्योंंकि अडाणी ने राजस्थान में निवेश किया है इसलिए उनके साथ ऐसा व्यवहार करना आवश्यक है अगर हम अंबानी जी की भी बात करें तो हम पायेंगे कि उनके बारे में भी यही कहा जाता रहा है कि उनका नाता हर सरकार से रहा है किसी ने एक किस्सा सुनाया था जब इंदिरा जी प्रधानमंत्री बनी तो उन्होंने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री से जहां कांग्र्रेस की सरकार थी कहा कि हमे पूंजीपतियों से धन नहीं चाहिए आप सामान्य व्यक्तियों से इसकी रसीद काटिए जो हमारी पार्टी के लिए इलेक्शन के काम आएगी। इस पर उस समय के तत्कालीन मुख्मयंत्री जी ने पूरे बंगाल में लोगों से अपनी पार्टी के माध्यम से रसीद के माध्यम से धन लेना प्रारंभ किया। तो पता लगा कि कुछ लाख रूपये ही इकट्ठे हो पाए जब इंदिरा जी ने उनसे प्रश्न किया कि कितना धन इकट्ठा हो गया तो उनका जबाब था कि इतना धन इकट्ठा हुआ है उससे बिल्कुल काम नहीं चल पाएगा। इतना धन तो हमें बंगाल का एक पूंजीपति ही दे देता। इस पर इंदिरा गांधी जी चुप हो गर्इं। क्योंकि इलेक्शन में पार्टी को भी फण्ड की आवश्यकता होती है।
अगर हम वास्तविकता देखें तो हम पायेंगे कि अडाणी हो या अंबानी जिस प्रदेश में या केंद्र में जिसकी भी सत्ता रही हो वो चाहे कांगे्रस हो, यूपीए हो या मोदी सरकार सभी को चुनाव के लिए धन की आवश्यकता होती है और वह केवल पूंजी पति से ही मिल सकता है। अगर हम टीवी चर्चाओं को ध्यान से देखें तो हर सरकार ने पंूजीपतियों को अपने स्तर से सहयोग किया है। वास्तविकता यह है कि हर सरकार को पार्टी के लिए एवं अन्य कामों के लिए धन की आवश्यकता होती है जो केवल पंूजीपतियों से मिल सकता है। देश प्रदेश की बात छोड़ भी दें तो हमें अपने जनपद और महानगरों में भी कमोबेश यही स्थिति मिल जाएगी। इसलिए किसी पर भी यह आरोप लगाना कि वह अपने कार्यकाल में पूंजीपतियों को सहयोग कर रहा है तो अनर्गल ही होगा क्योंकि यदि कोई भी पूंजीपति की बात तो छोड़िए किसी को भी कोई आर्थिक सहयोग करता है तो वह उसके बदले में अपेक्षा रखता ही है यह अगर हम अपने आपस देखेंगे तो हमें मिल ही जाएगा। इसलिए मेरी राय है कि विपक्ष को इस मुद्दे पर ही केवल मोदी सरकार को घेरना उचित नहीं होगा। मोदी सरकार को घेरने के लिए अन्य और भी मुद्दे हो सकते हैं।
अब हम आपको बता दें कि कोई भी सरकार रही हो समाजवादी हो, कांग्रेस हो, कम्युनिस्ट हो या भाजपा हो सभी को आर्थिक रूप से धन की आवश्यकता होती है और वह उसी हिसाब से मैंनेज करते हैं।
भाजपा और अन्य सरकारों में फर्क यह है कि अन्य सरकारें छोटों की ओर भी ध्यान देने का प्रयास करती हैं इस सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश में दो मुख्यमंत्री भाजपा के श्री कल्याण सिंह और समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव ऐसे अवश्य रहे जिन्होंने छोटों की ओर ध्यान देने का विशेष प्रयास किया। लेकिन भाजपा के अन्य मुख्यमंत्रियों का प्रयास इस ओर कोई विशेष नहीं देखा गया। अब अगर हम केवल मीडिया सेक्टर की बात करें तो भाजपा सरकारें यहां विपक्ष के आरोप के अनुसार मीडिया को खरीदने का प्रयास कर चुकी हैं वहीं मुझे ऐसा लगता है कि उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार इससे परे है क्योंकि वहां के मुख्यमंत्री सभी को एक समान समझते हैं और उनका प्रयास रहता है कि सभी को साधकर चला जाए। भाजपा और अन्य सरकारों में केवल यही फर्क देखने को मिलता आ रहा है इसमें अगर सुधार हो जाए तो मैं समझता हूं कि भाजपा सरकारों पर जो यह आरोप लगता है कि उन्होंने बड़े मीडिया को खरीद लिया है यह आरोप लगना बंद हो जाएगा और वह छोटे मीडिया के साथ भी अगर अपनी बात साझा करें तो मेरा मानना है कि गांव गांव तक निश्चित रूप से उनकी बात पहुंचेगी।

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