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आइची नागोया.
आइची नागोया एशियन गेम्स 2026 में भारत के अभियान की समाप्ती हो चुकी है। इस बार भारत ने 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य समेत कुल 85 पदक जीते। कुल पदकों की संख्या के लिहाज से भारत हांगझोउ एशियाई खेलों के 107 पदकों के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाया, लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है। एशियाई खेलों के आखिरी दो दिनों में भारत ने जोरदार वापसी की और 11 स्वर्ण पदक जीतकर खुद को चौथे स्थान पर बनाए रखा। यानी अभियान की शुरुआत और अंत में काफी अंतर रहा। लंबे समय तक भारत पदक तालिका में 10वें से 12वें स्थान के आसपास रहा, लेकिन आखिर में स्वर्ण पदकों की झड़ी ने तस्वीर बदल दी। अब सवाल है कि जापान में भारत ने क्या सही किया और कहां कमी रह गई? किन खेलों ने उम्मीद से ज्यादा दिया और किन खेलों ने निराश किया? आइए, पूरे अभियान का एनालिसिस करते हैं…

भारत ने पिछले एशियाई खेलों में रिकॉर्ड 107 पदक जीते थे। इनमें 28 स्वर्ण, 38 रजत और 41 कांस्य शामिल हैं। इस बार कुल संख्या 85 रही। स्वर्ण की संख्या 21, रजत 27 और कांस्य 37 रही। इस लिहाज से सबसे बड़ी चुनौती कुल पदकों की संख्या के साथ-साथ स्वर्ण पदकों में भी दिखी। हालांकि अंतिम दो दिनों में 11 स्वर्ण पदक जीतकर भारत ने अपनी स्थिति काफी हद तक संभाल ली। यही इस अभियान की सबसे बड़ी तस्वीर है- शुरुआत में संघर्ष, अंत में जोरदार वापसी।

1. टीम स्पर्धाओं में भारत का दबदबा
टीम स्पर्धाएं इस अभियान की सबसे बड़ी मजबूती रहीं। क्रिकेट में पुरुष और महिला दोनों टीमों ने स्वर्ण पदक जीता। पुरुष हॉकी टीम ने भी अपना खिताब बरकरार रखा और फाइनल में मलेशिया को 5-1 से हराया। इसके साथ टीम ने 2028 ओलंपिक के लिए सीधा कोटा भी हासिल किया। कबड्डी में भी भारत ने पुरुष और महिला दोनों वर्गों में स्वर्ण जीतकर अपना दबदबा कायम रखा। यानी जब मुकाबला व्यक्तिगत प्रदर्शन से आगे बढ़कर पूरी टीम की परीक्षा का था, तब भारत ने कई बड़े मौकों पर खुद को साबित किया।

2. तीरंदाजी ने दिया स्वर्ण का बड़ा सहारा
भारत के स्वर्ण अभियान में तीरंदाजी सबसे आगे रही। टीम ने इस खेल में पांच स्वर्ण पदक जीते। कुमकुम अनिल मोहोद इसका सबसे बड़ा चेहरा रहीं। उन्होंने महिला व्यक्तिगत रिकर्व में भारत के लिए ऐतिहासिक स्वर्ण जीता। यह इस स्पर्धा में किसी भारतीय महिला का पहला व्यक्तिगत रिकर्व स्वर्ण था। कुमकुम ने महिला टीम में भी स्वर्ण और मिश्रित टीम में रजत जीता। यानी एक ही खिलाड़ी ने तीन पदकों के जरिए भारत के अभियान में बड़ा योगदान दिया।

3. मुक्केबाजी और कुश्ती ने भी मजबूत वापसी की
मुक्केबाजी में भारत ने तीन स्वर्ण जीते। लवलीना बोरगोहेन और परवीन हुड्डा जैसे नाम इस अभियान की बड़ी उपलब्धियों में रहे। कुश्ती में भारत ने छह पदक जीते, जो 1962 के बाद इस खेल में उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा। अमन सेहरावत ने स्वर्ण जीतकर इस अभियान को खास बनाया। हांगझोउ के बाद जिन खेलों से उम्मीदें थीं, उनमें कुश्ती और मुक्केबाजी ने इस बार भारत को निराश नहीं किया।

4. यशवीर सिंह और रोहित यादव: नीरज नहीं थे, तो दोनों ने संभाली विरासत
नीरज चोपड़ा की गैरमौजूदगी में भारतीय भाला फेंक पर अतिरिक्त दबाव था। ऐसे में यशवीर सिंह और रोहित यादव ने एशियाई खेलों में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत को एक ही स्पर्धा में दो पदक दिलाए। नागोया की बारिश के बीच दोनों ने पोडियम पर जगह बनाई। इस प्रदर्शन ने दिखाया कि भारतीय भाला फेंक अब सिर्फ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं है। नीरज की गैरमौजूदगी में यशवीर और रोहित ने महाद्वीपीय मंच पर भारत की चुनौती को मजबूती से संभाला।

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