पूज्य माता श्रीमती ललिता शर्मा,
आध्यात्म की थीं वह निमार्ता।
दिव्य प्रेम की वह प्रतिमूर्ति,
धर्म शास्त्रों की थीं ज्ञाता।।
दया, ममता, करुणा की सागर,
वात्सल्य देवी उन्हें कहते लोग।
वह कहती थीं अशिक्षा, बीमारी,
है समाज में व्याप्त भीषण रोग।।
बच्चों की शिक्षा संस्कार पर,
दिया उन्होंने हमेशा ध्यान।
अब इनकी सुयोग्य संतान पर,
किसे नहीं होता अभिमान।।
डॉ महेश शर्मा ने निर्बाध रूप से,
स्वास्थ्य सेवाओं पर जोर दिया।
अथक परिश्रम से अंधकार मिटाकर,
”कैलाश” ज्योति से प्रकाश किया।।
मां के जीवन पर कुछ कहना,
सूरज को है दीपक दिखाना।
भावुकता से मां के श्री चरणों में,
श्रद्धा सुमन पुष्प हैं हमें चढ़ाना।।
प्रस्तुति:-
रवीन्द्र कुमार राणा
साहित्यकार एवं प्रकृति प्रेमी











