चुनाव आते ही मायावती व अखिलेश में 30 साल पुराने नारों पर राडा उभरा

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देश में या किसी राज्य में चुनाव हों और वहां नेताओं की जुबान से अपने विरोधियों के खिलाफ कोई बिगड़े बोल न निकलें,ऐसा कभी हो नही सकता।उत्तरप्रदेश के चुनाव में नेताओं की इस बदजुबानी ने कुछ ज्यादा ही गर्मी ला रखी है लेकिन शायद उन्हें ये अहसास नहीं कि वोटर अब पहले से भी इतना अधिक जागरुक हो चुका है,जो उनकी अमर्यादित भाषा को तो समझता ही है लेकिन वो ये भी जानता है कि इसके जरिये समाज में किस तरह की नफ़रत का माहौल बनाया जा रहा है।

गौरतलब है कि जिन राजनीतिक नारों ने मायावती को बहुजन समाज का नेता बनाया अब वे उन नारों पर सफाई देती फिर रही हैं। वे कह रही हैं ये नारे बसपा ने कभी दिए ही नहीं थे, बल्कि समाजवादी पार्टी ने बसपा को बदनाम करने के लिए इन नारों का प्रचार किया था। अगर ऐसा है तो मायावती ने या मान्यवर कांशारीम ने उस समय इन नारों का विरोध क्यों नहीं किया था? बसपा के कार्यकर्ताओं को इस तरह के नारे लगाने से रोका क्यों नहीं गया था? जाहिर है उस समय इन नारों से फायदा दिख रहा था इसलिए इन्हें अपनाया गया और अब जबकि मायावती ने अपने राजनीतिक सिद्धांतों को पूरी तरह से बदल दिया है तो वे इन नारों से पीछा छुड़ा रही हैं।उन्होंने बुधवार को तीन ट्विट किए, जिसमें नब्बे के दशक में चर्चित हुए नारों का विरोध किया और कहा कि ये नारे सपा ने गढ़े थे, बसपा को बदनाम करने के लिए। जब मुलायम सिंह और कांशीराम ने सपा और बसपा के बीच तालमेल किया था और 1993 का चुनाव लड़ा था तब एक नारा चर्चित हुआ था ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जयश्रीराम’। इसका जिक्र करते हुए मायावती ने ट्विट किया कि वास्तवमें यूपी के विकास व जनहित की बजाय जातिद्वेष एवं अनर्गल मुद्दों की राजनीति करना सपा का स्वभाव रहा है।

इसके बाद अगले ट्विट में उन्होंने लिखा ‘मान्यवार कांशीराम जी ने मिशनरी भावना के तहत गठबंधन बनाया था लेकिन मुलायम सिंह यादव के गठबंधन का सीएम बनने के बावजूद उनकी नीयत पाक साफ न होकर बसपा को बदनाम करने व दलित उत्पीड़न जारी रखने की रही’। उनका तीसरा ट्विट था, ‘इसी क्रम में अयोध्या, श्रीराम मंदिर व अपरकास्ट समाज आदि से संबंधित जिन नारों को प्रचारित किया गया था वे बीएसपी को बदनाम करने की सपा की शरारत व सोची समझी साजिश थी। अंतः सपा की ऐसी हरकतों से खासकर दलित, अन्य पिछड़ों व मुस्लिम समाज को सावधान रहने की सख्त जरूरत’।

नब्बे के दशक में उच्च जातियों को लेकर बसपा एक नारा चर्चित रहा था- तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार। अब मायावती कह रही हैं कि अपरकास्ट को लेकर नारे भी सपा ने लिखे थे। बहरहाल, मायावती ने जिस अंदाज में एक के बाद एक तीन ट्विट करके धर्म और ऊंची जाति वालों के लिए बनाए गए नारों से पीछा छुड़ाया है उससे लग रहा है कि वे अब पूरी तरह से भाजपा की लाइन पर राजनीति कर रही हैं। हालांकि यह कहना मुश्किल है कि वे इस लाइन पर राजनीति करके अपनी पार्टी के लिए सफलता की उम्मीद कर रही हैं या भाजपा के कहने पर ऐसा कर रही हैं। दोनों बातें हो सकती हैं। भाजपा के लिए अभी जरूरी हो गया है कि वह समाजवादी पार्टी को हिंदू विरोधी साबित करे। सपा के नेता रामचरितमानस पर बेसिरपैर के बयान देकर खुद ही यह काम कर रहे हैं। अब मायावती ने भी भाजपा की तर्ज पर सपा को निशाना बनाया है। इससे उनका बचा खुची मुस्लिम वोट भी हाथ से निकलेगा। दलित वोट टूट ही रहा है। सवर्ण वोट कितना मिलेगा यह कहा नहीं जा सकता।

बहरहाल सियासी गलियारों में मायावती के इन बयानों के अलग-अलग निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। माना यही जा रहा है कि समाजवादी पार्टी की ओर से दलित वोट बैंक में हो रही सेंधमारी से असहज होकर बहुजन समाज पार्टी ने ऐसा दांव चला है, जिसमें वह अपने पुराने नारों से पल्ला झाड़ रही हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पहले भाजपा और अब समाजवादी पार्टी जिस तरह से बसपा के वोट बैंक में सेंध मारने की कोशिश कर रही है, उससे बहुजन समाज पार्टी असहज है। यही वजह है कि बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने 1993 के दौर में लगाए जाने वाले नारों का ठीकरा समाजवादी पार्टी पर फोड़ दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती ने ट्वीट कर बसपा को बहुत ‘मासूमियत’ से किनारे करते हुए समाजवादी पार्टी पर ठीकरा फोड़ा है। जबकि हकीकत यह भी है कि ऐसे नारे सिर्फ समाजवादी पार्टी के नेता ही नहीं, बल्कि बसपा समर्थक और कद्दावर नेता भी मंच से लगाया करते थे।

दरअसल समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने मंगलवार को कांशीराम की प्रतिमा के अनावरण के दौरान 1993 के दौर में सपा और बसपा के गठबंधन में लगाए जाने वाले नारे को लगाया। उसके बाद ही उत्तर प्रदेश में तीन दशक पुराने नारों को लेकर मायावती का बयान सामने आया। मायावती ने ट्वीट कर कहा कि सपा प्रमुख की मौजूदगी में ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ नारे को लेकर रामचरित मानस विवाद वाले सपा नेता पर मुकदमा हुआ है। मायावती का इशारा स्वामी प्रसाद मौर्य की ओर था। उन्होंने कहा कि 1993 में कांशीराम ने सपा-बसपा गठबंधन मिशनरी भावना के तहत किया था। लेकिन मुलायम सिंह यादव के गठबंधन का सीएम बनने के बावजूद उनकी नीयत पाक-साफ न होकर बसपा को बदनाम करने व दलित उत्पीड़न को जारी रखने की रही। मायावती ने इस दौरान बसपा का बचाव करते हुए कहा कि इसी क्रम में उस दौरान अयोध्या, श्रीराम मंदिर व अपर कास्ट समाज से सम्बंधित जिन नारों को प्रचारित किया गया था, वह बीएसपी को बदनाम करने की सपा की शरारत व सोची-समझी साजिश थी। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि अचानक 30 साल बाद मायावती का अपने विवादित नारों के बचाव में ट्वीट करना सियासत में बड़े इशारे करता है।जिस तरीके से समाजवादी पार्टी ने स्वामी प्रसाद मौर्य के कॉलेज में कांशीराम की प्रतिमा लगवा कर 1993 का विवादित नारा लगाया, उसी के बदले में मायावती ने यह काउंटर ट्वीट किया है। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि मायावती ने इस ट्वीट के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि सपा और बसपा के गठबंधन के दौर में लगाए जाने वाले वह नारे जिसमें क्षत्रिय, ब्राह्मण और वैश्य समेत राम मंदिर और अयोध्या के अलावा अपर कास्ट को निशाने पर लिया जाता था, वह समाजवादी पार्टी की साजिश थी। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार आरएन सिंह कहते हैं कि स्वामी प्रसाद मौर्य ने मंगलवार को 1993 के दौर के नारे लगाए, तो मायावती को यह कहने का मौका मिल गया कि यह नारे तो सपा मुखिया के साथ ही लगाए जाते रहे थे। वह चाहे मुलायम सिंह यादव का दौर रहा हो या फिर अखिलेश यादव का।

कभी उच्च जाति और राम अयोध्या के नाम पर बसपा के लगाए जाने वाले नारों पर एक तरह से मायावती ने तीस साल बाद सफाई दी है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मायावती ने ऐसा करके अपने कैडर वोट में लगी सेंधमारी को रोकने का प्रयास किया है। इसके अलावा जिन नारों से अपर कास्ट के लोग नाराज होते थे, उन्हें भी 30 साल बाद ही सही यह बताने की कोशिश की है कि वह नारे बसपा नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी लगवाती थी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 30 साल बाद अचानक अपने नारों के लिए मायावती की ओर से एक तरह से जारी की गई सफाई का अब कितना फायदा होगा, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन मायावती की सियासी लाइन का अंदाजा जरूर हो जाता है। इस पूरे मामले पर वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषको का मानना है कि स्वामी प्रसाद मौर्य जो कुछ भी बोल रहे हैं, वह कुछ भी नया नहीं है। शुक्ला कहते हैं कि एक तरह से स्वामी प्रसाद मौर्य उन्हीं पुराने आजमाएं हुए और धार खो चुके हथियारों को अखिलेश यादव के मंच से साझा कर रहे हैं, जो कभी बसपा मुखिया मायावती इस्तेमाल करती थीं। उनका मानना है कि इस तरीके के बयानों से समाजवादी पार्टी को फायदा होने की बजाय नुकसान होने की गुंजाइश ज्यादा है।

अशोक भाटिया,

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