नई दिल्ली। जीएसटी व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। जीएसटी परिषद सात अक्तूबर को होने वाली बैठक में कर अधिकारियों की गिरफ्तारी की शक्तियां खत्म करने और गिरफ्तारी के लिए अदालत की मंजूरी अनिवार्य करने के प्रस्ताव पर विचार कर सकती है। इसके साथ ही, कर से जुड़े अपराधों में आपराधिक मुकदमा शुरू करने की सीमा एक करोड़ रुपये से बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव है। सरकार का जोर अब गिरफ्तारी के बजाय टैक्स वसूली, ब्याज और जुर्माने के जरिये कार्रवाई करने पर है। ये प्रस्ताव मंजूर होने पर जीएसटी के तहत कारोबारियों के खिलाफ कार्रवाई का तरीका बदल सकता है।
गिरफ्तारी नियमों में क्या बदलाव होने जा रहा है?
जीएसटी परिषद के सामने केंद्रीय जीएसटी कानून की धारा 69 में बदलाव का प्रस्ताव है। अभी इस धारा के तहत तय शर्तें पूरी होने और निर्धारित अपराध होने का विश्वास करने के आधार पर आयुक्त किसी अधिकारी को गिरफ्तारी की अनुमति दे सकता है। प्रस्ताव के मुताबिक, यह शक्ति कर अधिकारियों से वापस ली जा सकती है। इसके बाद किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए अदालत की मंजूरी जरूरी होगी। हालांकि, इस प्रस्ताव पर परिषद की मुहर लगना बाकी है।
आपराधिक मुकदमा शुरू करने की सीमा कितनी बढ़ेगी?
अभी जीएसटी के बड़े अपराधों में एक करोड़ रुपये से अधिक की कर चोरी, फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट या गलत रिफंड के मामलों में आयुक्त स्तर के अधिकारी की मंजूरी के बाद गिरफ्तारी हो सकती है। प्रस्ताव में आपराधिक मुकदमा शुरू करने की सीमा एक करोड़ रुपये से बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये करने की बात है। इसका मतलब यह नहीं है कि पांच करोड़ रुपये तक की कर चोरी माफ हो जाएगी। ऐसे मामलों में भी सरकार टैक्स वसूल सकती है और ब्याज तथा जुर्माना लगा सकती है। गंभीर धोखाधड़ी के मामलों में अदालत के जरिए आपराधिक कार्रवाई जारी रह सकती है।
किन मामलों में कारोबारियों को राहत मिल सकती है?
प्रस्ताव का उद्देश्य सामान्य कर विवादों को आपराधिक कार्रवाई से अलग रखना है। वस्तुओं के वर्गीकरण, उनकी कीमत तय करने या इनपुट टैक्स क्रेडिट को लेकर कारोबारी और कर अधिकारी अलग-अलग राय रखते हैं। ऐसे विवादों में हर मामले को आपराधिक मुकदमे तक ले जाने के बजाय टैक्स वसूली और आर्थिक दंड पर जोर दिया जा सकता है। देर से रिटर्न दाखिल करने, कर भुगतान में देरी या कारोबार की नकदी स्थिति के कारण भुगतान अटकने जैसे मामलों में भी टैक्स, ब्याज और उचित जुर्माना चुकाकर राहत पाने का रास्ता आसान हो सकता है। हालांकि, यह प्रस्तावित बदलावों के लागू होने पर निर्भर करेगा।
