आर. एस. एस. :- लक्ष्य एक कार्य अनेक

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रवीन्द्र कुमार राणा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सामाजिक,सांस्कृतिक एवं वैचारिक संगठन है। जो विरोध,अवरोध,उपेक्षा से परे निर्विवाद होकर राष्ट्र की सेवा, मानवीय मूल्यों की रक्षा और देश की आंतरिक सुरक्षा करने में एक सौ वर्षों से कार्यरत है, सुनामी, भूस्खलन, भूकंप,बाढ़, कोरोना, प्लेग, महामारी जैसी कई प्राकृतिक आपदाओं में निस्वार्थ भाव से राष्ट्र सेवा में समर्पित रहा है। देश में कुछेक मानव जनित आपदाओं सांप्रदायिक हिंसा, नक्सलवाद, उग्रवाद,आतंकवाद, अलगाववाद, रेल व सड़क दुर्घटनाओं सहित जातीय संघर्षों से मानवता को बचाने, समाज को मानवीय सहायता पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह विश्व बंधुत्व , वसुधैव कुटुंबकम् और लोक मंगल की कामनाओं से ओतप्रोत अद्वितीय संगठन है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा राष्ट्र सेवा, समर्पण और मानवीय गुणों को विकसित करने की प्रेरणा रूपी जलाई गई प्रखर ज्योति अपने ध्येय को साकार कर रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सभी ध्येय, नीतियां, तत्वज्ञान और लाखों शाखाएं परम् पवित्र भगवा ध्वज को गुरु मानकर क्रियान्वित होती हैं इसीलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विश्व का अनूठा, अद्वितीय और अदभुत संगठन है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का परम् पवित्र भगवा ध्वज भारतीयता का गौरव है अपितु भारतीय सनातन संस्कृति का संवाहक है, जो संपूर्ण मानवता को समता, समरसता और मानवीय मूल्यों के अलौकिक सूत्र में पिरोने की अभिव्यक्ति है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सदैव भारतीयता की जड़ों को सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक सेवा कार्यों से पोषित किया है। संघ एक भारत श्रेष्ठ भारत का प्रबल पक्षधर है। सेवा, संघर्ष, समर्पण, समता, संस्कार, समरसता, देश प्रेम, दया, करुणा, त्याग, राष्ट्र भक्ति के मानवीय गुणों का कर्तव्यबोध, राष्ट्र निर्माण की अभिव्यक्ति और लोकहित की सद्भावनाओं को समर्पित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विजयादशमी पर्व पर आज अपने गौरवशाली सौ वर्ष पूर्ण कर रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी शताब्दी यात्रा में केवल ऊंचाइयां ही नहीं छुई बल्कि देश की गौरवशाली प्राचीन संस्कृति, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता को पुर्नजीवित किया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तपोनिष्ठ स्वयंसेवकों, प्रचारकों ने अपनी परवाह न करते हुए भारतभूमि को परम वैभव पर विराजमान करने तथा भारत को शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की संकल्प सिद्धि और कर्तव्यबोध का अक्षरशः पालन करते हुए राष्ट्र धर्म निभाया। राष्ट्र सेवा, समर्पण और मानवीय मूल्यों की रक्षा को सदैव तत्पर रहने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तपोनिष्ठ स्वयंसेवकों, राष्ट्र भक्त प्रचारकों ने अपने लिए कभी कुछ नहीं, जो भी किया राष्ट्र सेवा को समर्पित होकर किया बल्कि इनकी कई पीढ़ियां राष्ट्र आराधन में खप गईं, मिट गईं, इन्होंने अपना सर्वस्व राष्ट्र को न्योछावर कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सदैव इन गगन स्पर्शी एवं राष्ट्रभक्त स्वयंसेवकों, प्रचारकों का निर्माण किया, जो आज विभिन्न सेवा प्रकल्पों, आयामों द्वारा विविध क्षेत्रों में समर्पित होकर अपनी नेतृत्व क्षमता और व्यक्तित्व के तपोबल से मां भारती को परम् वैभव पर विराजमान करने को सतत् प्रयासरत हैं, आज संघ के अनेकानेक स्वयंसेवक,प्रचारक अपनी प्रामाणिक बुद्धिमत्ता और मानवीय गुणों के तपोबल से समूची धरा के लिए प्रेरणास्रोत बन चुके हैं। धन्य हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक और प्रथम सरसंघचालक परम् पूज्य डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी जिन्होंने असुरक्षा और संदेह के अंधेरों को चीरते हुए राष्ट्र आराधन के अडिग पाथेय पर चलते हुए भारतीय जनमानस में मानवीय मूल्यों का निर्माण तथा राष्ट्र सेवा करने का गौरवशाली पथ चुना। डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी के तपोनिष्ठ चिंतन और मानवीय दृष्टिकोण ने राष्ट्र सेवा, समर्पण, त्याग, धैर्य, अनुशासन, अथक परिश्रम और लोकमंगल की भावना को जन्म दिया, आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी वर्ष यात्रा में लक्ष्य एक कार्य अनेक की दृढ़ संकल्प शक्ति, संघर्ष, मानसिक दृढ़ता और उतार चढ़ाव समूची धरा को राष्ट्र सेवा एवं मानवीय मूल्यों को विकसित करने की सद्प्रेरणा दे रही है। सौ वर्ष पूर्व परम् पूज्य डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रूपी जो बीज बोया था, वह रोपित बीज आज विशाल वटवृक्ष की लाखों शाखाओं और करोड़ों पत्तियों के रूप में विश्व धरा को पुष्पित, पल्लवित और गौरवान्वित कर रहा है। राष्ट्र प्रथम, राष्ट्र सर्वोपरि के कर्तव्य बोध से ओतप्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक, प्रचारक राष्ट्र आराधन में दृढ़ता पूर्वक कार्यरत है। तपोनिष्ठ लाखों स्वयंसेवक एवं प्रचारक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पूंजी हैं,आधारशिला हैं।
(लेखक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक सरोकारों से जुड़े हैं)