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देहरादून। आम आदमी अपने हक की आवाज उठाने को सड़कों पर है, तो वन्य जीव भी पीछे नहीं। गाहे बगाहे आबादी में धमक कर वे जंगलों में बढ़ते वन अपराध और अतिक्रमण का मूक विरोध जता रहे हैं। नतीजा मानव-वन्यजीव संघर्ष के रूप में सामने है। सरकार ने इस पर चिंता जताते हुए वर्ष 2005 में वन्य अपराध पर नकेल लगाने की योजना बनाई।
उत्तर प्रदेश के जमाने से चली आ रही एंटी पोचिंग सेल को और दुरुस्त करने का निर्णय लिया गया। मुखबिर तंत्र को और मजबूत बनाने की कवायद शुरू हुई। फैसला लिया गया कि एंटी पोचिंग सेल को एक अधिकारी के हवाले न छोड़ इसके लिए पूरी टीम बनाई जाएगी। बजट की राशि बढ़ाई जाएगी। कागजों पर योजना तेजी से दौड़ी मगर धरातल पर नहीं उतर पाई। नतीजा, आज भी वन्यजीव स्वयं पर हो रहे अत्याचारों के कारण बार-बार आबादी का रुख कर अपना विरोध जता रहे हैं।
सरकार के कदम को देखकर ऐसा लगा कि प्रदेश में सरकारी सेवाएं पटरी पर आ जाएंगी। अधिकारी और कर्मचारी अपने कार्य के प्रति ज्यादा गंभीर नजर आएंगे। कोई लापरवाही दिखाएगा तो उसे बाहर करने में देर नहीं लगाई जाएगी। इस उम्मीद को परवान चढ़ाया सरकार के अनिवार्य सेवानिवृत्ति के फरमान ने। सरकार ने साफ किया कि अब नाकारा, भ्रष्ट और लापरवाह अधिकारियों को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
सभी विभागाध्यक्षों को ऐसे कर्मचारियों को चिह्नित कर सूची शासन को भेजने के निर्देश दिए गए। इससे कर्मचारियों में हड़कंप मचा। विभागों ने सूची तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की। लापरवाह कार्मिकों के नाम ढूंढे जाने लगे। फिर अचानक ही इस मामले में ब्रेक लग गया। शासन के कई बार रिमाइंडर भेजने के बावजूद अभी तक विभागों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। अब हालत यह है कि शासन ने भी फिलहाल इस पर सूचना मांगना छोड़ दिया है।

By Admin

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