यह अध्ययन ‘मैमल रिव्यू’ नाम की वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इसमें दुनिया भर के पुराने-पुराने अध्ययनों का विश्लेषण किया गया है। शोधकर्ताओं ने पाया कि समुद्र में बीमारियां फैलने का कारण सिर्फ यह नहीं होता कि कितने जानवर एक जगह पर हैं। असली बात यह है कि कौन सा जानवर किसके संपर्क में आता है, कितनी बार आता है और कितने गहरे रिश्ते हैं। यानी सामाजिक नेटवर्क कितना मजबूत और जुड़ा हुआ है, यह बहुत मायने रखता है।आजकल जीवों में संक्रामक रोगों का खतरा बहुत बढ़ गया है। समुद्री स्तनधारी भी इससे बच नहीं पा रहे। जलवायु परिवर्तन, समुद्र में प्रदूषण, मछली पकड़ने की ज्यादा गतिविधियां, जहाजों का शोर और आवास का नुकसान, ये सब इन जानवरों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर रहे हैं। नतीजा यह होता है कि छोटा-मोटा संक्रमण भी इनके लिए जानलेवा बन जाता है।समूह की संरचना भी बहुत मायने रखती है। कुछ समूहों में छोटे-छोटे उप-समूह होते हैं। ये उप-समूह कभी रोग को धीमा कर देते हैं, क्योंकि बीमारी एक उप-समूह से दूसरे तक धीरे पहुंचती है। लेकिन कभी-कभी यही उप-समूह रोग को लंबे समय तक जीवित रखते हैं, क्योंकि बीमार जानवर उसी छोटे ग्रुप में रह जाते हैं और धीरे-धीरे फैलाते रहते हैं। सिर्फ जानवरों की संख्या गिनना काफी नहीं है। हमें उनके सामाजिक रिश्तों को समझना होगा। कौन किससे जुड़ा है, कौन सबसे ज्यादा संपर्क में रहता है, यह जानकारी रोग की पहचान और रोकथाम में बहुत मदद कर सकती है। समुद्र में निगरानी करना बहुत मुश्किल है। वैज्ञानिक पानी के नीचे कैमरे, ट्रैकिंग डिवाइस और अन्य तरीकों से कोशिश करते हैं, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं मिल पाती। इसलिए सामाजिक नेटवर्क का अध्ययन करके हम अनुमान लगा सकते हैं कि रोग कहां से और कैसे फैल सकता है। यह अध्ययन चेतावनी देता है कि बदलते पर्यावरण में समुद्री स्तनधारियों का भविष्य खतरे में है। जलवायु परिवर्तन से समुद्र का तापमान बढ़ रहा है,व्हेल, डॉल्फिन और सील जैसे समुद्री जीवों की ताकत ही बन गई सबसे बड़ी कमजोरी, समुद्री स्तनधारियों के सामाजिक रिश्ते जितने मजबूत हैं उतनी ही बड़ी चुनौतियां भी है। समुद्री स्तनधारियों के बारे में समझना अब और भी जरूरी हो गया है क्योंकि इनकी ताकत ही सबसे बड़ी कमजोरी बनकर सामने आई है।व्हेल, डॉल्फिन और सील जैसे समुद्री स्तनधारी बहुत सामाजिक जीव होते हैं। ये अकेले नहीं रहते, बल्कि बड़े-बड़े समूहों में साथ रहते हैं। ये एक-दूसरे के साथ लंबे समय तक रिश्ते बनाते हैं, कई सालों तक, कभी-कभी तो दशकों तक। ये साथी उनके लिए परिवार जैसे होते हैं। साथ रहने से इन्हें कई फायदे मिलते हैं, जैसे शिकार ढूंढना आसान हो जाता है, शिकारियों से बचाव बेहतर होता है और बच्चे सुरक्षित रहते हैं। लेकिन, एक नई रिसर्च में पता चला है कि ये घनिष्ठ सामाजिक रिश्ते एक समस्या भी पैदा कर सकते हैं। इससे संक्रामक बीमारियां बहुत तेजी से फैल सकती हैं। ऑक्सीजन कम हो रही है, प्रदूषक बढ़ रहे हैं, ये सब जीवों की सेहत को प्रभावित कर रहे हैं। अगर हम उनके सामाजिक जीवन को नहीं समझेंगे, तो बीमारियां और भी तेजी से फैल सकती हैं, जिससे कई प्रजातियां खतरे में पड़ सकती हैं। निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि इन जानवरों को बचाने के लिए सिर्फ रोगजनकों (वायरस, बैक्टीरिया) पर ध्यान देना काफी नहीं। हमें उनके सामाजिक व्यवहार, रिश्तों और नेटवर्क को भी उतना ही महत्व देना होगा। अगर हम समझ पाएंगे कि रोग कैसे और किसके जरिए फैलता है, तो हम बेहतर तरीके से रोकथाम कर सकेंगे। समुद्र में बीमारियां अचानक फैलती हैं और इनका अनुमान लगाना बहुत मुश्किल होता है। कई साल तक पूरी आबादी स्वस्थ दिखती है, लेकिन अचानक अगले साल सैकड़ों जानवर बीमार पड़ जाते हैं या मर जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि रोग धीरे-धीरे फैलते हैं और फिर एकदम तेज हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, मोर्बिलिवायरस नाम का वायरस, जो खसरे जैसा होता है, बहुत खतरनाक है। यह यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में डॉल्फिन और सील की बड़ी संख्या में मौत का कारण बन चुका है। इसी तरह लोबोमाइकोसिस नाम की एक त्वचा की बीमारी डॉल्फिन समूहों में फैलती है, जिससे उनकी त्वचा पर लंबे समय तक घाव बनते हैं और उनका स्वास्थ्य कमजोर हो जाता है।समुद्र में इन बीमारियों को समझना और रोकना इसलिए भी कठिन है क्योंकि वैज्ञानिक हर चीज को देख नहीं सकते। वो पानी के नीचे हर जानवर के संपर्क को ट्रैक नहीं कर पाते। बीमार जानवर को समय पर अलग करना भी असंभव होता है। इसलिए रोग फैलने का पैटर्न समझना बहुत जरूरी है। यह अध्ययन 14 ऐसे वैज्ञानिक पेपरों की समीक्षा पर आधारित है, जिनमें सामाजिक नेटवर्क विश्लेषण (सोशल नेटवर्क एनालिसिस) का इस्तेमाल किया गया था। ये ज्यादातर उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के अध्ययन थे। इनमें देखा गया कि किसी जानवर के कितने दोस्त हैं, वह कितनी बार मिलता-जुलता है और क्या वह समूह के बीच में सबसे महत्वपूर्ण है।एक बड़ा निष्कर्ष यह निकला कि कुछ खास जीव रोग फैलाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। इन्हें ‘सुपर-स्प्रेडर’ कहा जा सकता है। ये वो जानवर होते हैं जो समूह में सबसे ज्यादा जुड़े होते हैं, यानी बहुत सारे साथियों से संपर्क में रहते हैं। अगर ये बीमार पड़ जाएं, तो बीमारी पूरे समूह में बहुत तेजी से फैल सकती है। डॉल्फिन समुदायों में ऐसे जानवरों के कारण संक्रमण तेजी से पूरे ग्रुप तक पहुंच जाता है।











